वक़्त और मोका ये दोनों एक दुसरे के बिपरीत बने हुए हैं. वक़्त और मोका ये दोनों ने ना कभी साथ चलना जाना है .................. ना कभी साथ चल सकेंगे.
कल था वो दिन जब मोका आया लेकिन मुआ ऐसा बे मोका आया की मैं कुच्छ नहीं कर सका ..
बस हाथ पे हाथ रख कर उस मोके को जाते देखता रह गया..........
ख्वाब था शायद ख्वाब ही होगा सोच कर दिल को तसल्ली दी पर ये दिल भी आमिर की स्टाइल मैं गाना गाने लगा की दिल है की मानता नहीं.
आज वक़्त मेरे साथ है पर मोका नहीं है.
क्या करें हमारी और आपकी ज़िन्दगी केवल एक दुसरे की नहीं होती हैं.
हमारे और आपके एक निर्णय पे दुनिया के अनेक फैसले टिके होते हैं.
जिनसे दुनिया बदल जाती है.
मैं नहीं चाहता था की कोई गुबार आए या कोई
कोई घटना घटे
देखता रह गया तो बस यु हीं..........
एक घटना को घटते हुए..................
Written by AVNISH SHARMA
Monday, September 29, 2008
Saturday, September 27, 2008
रुपहला स्वप्न
बंद अधरों में
उद्विग्न मन के मुखर गीत,
शब्दों की लहरें
उठती हैं, मचलती हैं
और खो जाती हैं ह्रदय के सागर में
शीतल पवन सरका जाता है
आँचल मेरा ,संभालने से पहले
नयनों के निर्झर रुकते नहीं
बहते हैं अविरल,अविराम
और तब हो जाता है कितना
स्वछन्द यह नटखट मन
लगता है जैसे प्रलय मेघों से
मुक्त हुआ नीला आकाश
अतीत के आवर्त में डूबता है मन
शिथिल होता है तन, और
सृजन होता है एक रुपहले स्वप्न का
उद्विग्न मन के मुखर गीत,
शब्दों की लहरें
उठती हैं, मचलती हैं
और खो जाती हैं ह्रदय के सागर में
शीतल पवन सरका जाता है
आँचल मेरा ,संभालने से पहले
नयनों के निर्झर रुकते नहीं
बहते हैं अविरल,अविराम
और तब हो जाता है कितना
स्वछन्द यह नटखट मन
लगता है जैसे प्रलय मेघों से
मुक्त हुआ नीला आकाश
अतीत के आवर्त में डूबता है मन
शिथिल होता है तन, और
सृजन होता है एक रुपहले स्वप्न का
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