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Saturday, September 27, 2008

रुपहला स्वप्न

बंद अधरों में
उद्विग्न मन के मुखर गीत,
शब्दों की लहरें
उठती हैं, मचलती हैं
और खो जाती हैं ह्रदय के सागर में
शीतल पवन सरका जाता है
आँचल मेरा ,संभालने से पहले
नयनों के निर्झर रुकते नहीं
बहते हैं अविरल,अविराम
और तब हो जाता है कितना
स्वछन्द यह नटखट मन
लगता है जैसे प्रलय मेघों से
मुक्त हुआ नीला आकाश
अतीत के आवर्त में डूबता है मन
शिथिल होता है तन, और
सृजन होता है एक रुपहले स्वप्न का