बंद अधरों में
उद्विग्न मन के मुखर गीत,
शब्दों की लहरें
उठती हैं, मचलती हैं
और खो जाती हैं ह्रदय के सागर में
शीतल पवन सरका जाता है
आँचल मेरा ,संभालने से पहले
नयनों के निर्झर रुकते नहीं
बहते हैं अविरल,अविराम
और तब हो जाता है कितना
स्वछन्द यह नटखट मन
लगता है जैसे प्रलय मेघों से
मुक्त हुआ नीला आकाश
अतीत के आवर्त में डूबता है मन
शिथिल होता है तन, और
सृजन होता है एक रुपहले स्वप्न का
उद्विग्न मन के मुखर गीत,
शब्दों की लहरें
उठती हैं, मचलती हैं
और खो जाती हैं ह्रदय के सागर में
शीतल पवन सरका जाता है
आँचल मेरा ,संभालने से पहले
नयनों के निर्झर रुकते नहीं
बहते हैं अविरल,अविराम
और तब हो जाता है कितना
स्वछन्द यह नटखट मन
लगता है जैसे प्रलय मेघों से
मुक्त हुआ नीला आकाश
अतीत के आवर्त में डूबता है मन
शिथिल होता है तन, और
सृजन होता है एक रुपहले स्वप्न का
4 comments:
अतीत के आवर्त में डूबता है मन
शिथिल होता है तन, और
सृजन होता है एक रुपहले स्वप्न का
बहुत खूब ! कविता के भाव और प्रस्तुति दौनों की सुंदर बन पड़ी हैं और सच कहूँ तो उम्मीद से ज्यादा ! लिखना निरंतर जारी रखें ! अपने ब्लॉग को चिट्ठाजगत से जोड़ दें,बहुत लोग पढेंगे !
अच्छा हुआ हमारी बिरादरी में एक सदस्य और जुड़ा !
"सृजन होता है एक रुपहले स्वप्न का"
बहुत खूब, शुभकामनाएं!
bahut badiya
aapki kavita MERE DIL KO CHHU GAI, BAHUT ACHHE AAGE BHI LIKHTE RAHE
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